महाशिवरात्रि-२०२२ आखिर क्यों हैं प्रेरणा का स्त्रोत 🙏🙏🙏🙏🙏

तो भक्तों जैसा की हम जानते हैं की शिव की महिमा ही निराली हैं और जो भक्त इस रंग से रंग जाता हैं वह स्वयं को तार लेता हैं और अपने आपको शिव के प्रति समर्पित कर देता हैं | तो चलिए अब जानते हैं की आखिर शिवरात्रि कब और क्यों बनायी जाती हैं और फिर जानेंगे की कैसे शिव बने एक प्रेरणा स्त्रोत -



आखिर कब बनायीं जाती हैं महाशिवरात्री ?

इस बार जो महाशिवरात्रि आने वाली हैं वो १  मार्च को आ रही हैं | इस दिन भक्तो की टोली अपने  प्रभु से मिलने के लिए नीलकंठ जाती हैं | 

महाशिवरात्रि ज्यादातर फाल्गुन महीने में मनायी जाती हैं जो साल का सबसे शिवरात्रि मानी जाती हैं | लोग मुख्यतः इस दिन की शुरुवात ब्रह्ममुहूर्त में नहाके करते हैं | उसके बाद फिर जनेऊ धारण करते हैं अपने इष्टदेव भोलेनाथ और माता पार्वती का नाम लेकर | 

उसके बाद माता पार्वती और भगवान् शिव को भी जनेऊ धारण कराया जाता हैं और उनकी अच्छे मन से भक्ती की जाती  हैं | उसके बाद फिर उनके ऊपर अक्षत ,पान,  चन्दन का टीका , इलायची ,दूध ,दही ,घी, धतूरा , भेलपत्र ,कमलगट्टा और फल फूल अर्पित करते हैं भगवान् शिव को और माता पार्वति  को | 



ये दिन बहुत ही सुबह होता हैं क्योकि इस समय संसार की दो शक्तियां मिलती हैं जो की शिव और उनकी शक्ति जो की पार्वती माता हैं | शिव को मृत्यु का देवता माना जाता हैं और शक्ति वह हैं जो बुरी शक्तियों का  विनाश करती हैं और पूरा संसार उन्हें शिव शक्ति के नाम से जानती और पूजती हैं | 

महाशिवरात्रि बनाने के पीछे की कथा क्या हैं ? 

प्राचीनकाल में इससे बहुत सारी बातें जुड़ी हुई हैं जैसे की एक कहानी कहती हैं की जब समुद्र मंथन हुआ था तो जो देवताओं और राक्षसों के बीच हुआ था तो उसमें बहुत सारी चीज़ें निकली थी जैसे की पन्ना ,सोना,चाँदी ,हीरे ,जवाहरात ,अमृत और कालकूट विष(जहर )भी निकला था | 

वह विष इत्ता भयानक था की देवता और राक्षस चिंता में आ गए थे की क्या करे इस विष का क्योकि विष में इत्ती छमता थी की वह पूरे संसार को नष्ट कर सकता था | तो इस विष को संसार से बचाने के लिए शिव जी ने अपने कंठ में उस विष को स्थापित कर लिया | जिसकी वजह से उनका गला नीला हो गया और वो नीलकंठ भी कहलाते हैं | 



 शिवरात्रि इसी के उपलक्ष्य में बनायी जाती हैं की उस दिन  भगवान् ने विष पीकर सभी संसार को बचाया था | इससे जुड़ी हुई दूसरी भी घटना हैं की बहुत समय पहले ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच लड़ाई हो रही थी इस बात के लिए के उन में से कौन ज्यादा सर्वश्रेष्ठ हैं ?

तो सारे जो दूसरे देवता थे वो चिंता में आ गए की अब इस युद्ध को कैसे रोकेंगे | फिर वो सारे इन सब का हल ढूंढने के लिए महादेव के पास गए और उनसे कहा की -"प्रभु आप ही इस समस्या का हल ढूंढ सकते हैं "| उसके बाद फिर भगवान् शंकर को एक युक्ती सूझी | 

उन्होंने बहुत बड़े ज्योतिर्लिंग का अवतार ले लिए जिसकी ऊर्जा से पूरा ब्रह्माण्ड प्रकाशित हो रहा हैं और ये भी नहीं पता था किसी को की ये उत्पन्न कहा से हुआ हैं और ख़त्म कहा से होगा | उसके बाद फिर दोनों देवताओं ने ये निश्चय किया की जो इस ज्योतिर्लिंग का छोर को ढूंढेगा वही सर्वश्रेष्ठ होगा | 

दोनों उसका छोर को ढूंढने के लिए निकल पड़े | ब्रह्मा ज्योतिर्लिंग के ऊपरी छोर पर चल दिए और विष्णु धरती की और चल दिए की कहि न कहि तो उनको इसका आखरी छोर मिलेगा | मीलों तक भ्रमण करने के बाद भी उन्हें कोई छोर  ही नहीं मिला | 

फिर अंत में दोनों देवता पहुंचे भगवान् शिव के पास |उसके बाद विष्णु जी को तो छोर ही नहीं मिला था तो उन्होंने आके बोला की -"प्रभु में असमर्थ हूँ ढूंढने में "| और वही दूसरी तरफ ब्रह्मा जी ने केतकी के पुष्प से झूठ बुलवाया की यह पुष्प साक्षी हैं की मैंने ज्योतिर्लिंग कहा से उत्पन्न हुआ हैं वह खोज निकाला हैं | 

पर शिव जी तोह सब जानते थे और वह त्रिकालदर्शी थे तो उन्होंने भगवान् ब्रह्मा का एक सर काट दिया और ये भी कहा की आज के बाद मेरे पूजा पाठ में केतकी के फूल का इस्तमाल नहीं होगा | और मैं इस पुष्प की पूजा को कभी भी स्वीकार नहीं करूंगा | 



तो ये दो कहानी जुडी हुई हैं महाशिवरात्रि के ऊपर और उस दिन भगवान् शिव ने ज्योतिर्लिंग का अवतार लिया था और पुरे विश्व को अपने ऊर्जा से प्रकाशवान किया था | 

कैसे हैं महाशिवरात्रि एक प्रेरणास्त्रोत पर्व ?

तो आप लोगों ने अभी ये दो कहानियां सुनी जिससे हमें ये पता चला की शिवरात्रि बनाने का मुख्य कारण क्या होता हैं क्योकि दोनों बातों में कुछ कुछ बातें मिलती हुई सी ही लगती हैं जैसे की पहले कहानी में उन्होंने विष पी लिया था संसार की भलाई के लिए तो इससे यह प्रेरणा मिलती हैं की | 

अगर हमें भी किसी असहाय ,दुखी या फिर लाचार की मदद करने का मौका मिले तो हमें भी कभी पीछे नहीं हटना चाहिए और दूसरा ये हैं की कभी भी अपने विश्वास को अपने प्रभु या भगवान् के प्रति कम नहीं होने देना चाहिए क्योकि वो जो भी करेंगे उसमें कहि न कहि हमारी भलाई ही छुपी हुई होगी | 

और दूसरी कहानी से ये पता चलता हैं की हमेशा ही हमें अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए और हर जगह अपनी ऊर्जा से सबको प्रकाशवान करना चाहिए | और इस समय जो शिव के भक्त होते हैं वे भगवान् शिव का जाप करते हैं जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो | 

और ये भी कहा जाता हैं की जो सच्चे मन से शिव जी की पूजा करता हैं उसके युगों युगों के पाप धुल जातें हैं | और ऐसे ही हमें सत्यता का मार्ग धारण करके उस मार्ग में चलना चाहिए | यही इस पर्व का सार हैं | 

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