"हारने का डर का मनोवैज्ञानिक कारण "

मनोवैज्ञानिक तथ्य जो हारने का मुख्य कारन होते हैं |  तो दोस्तों मैं आपको बताना चाहूंगी की कैसे आप अपने डर को भगा सकते हैं अपने जीवन से और दूसरे लोगों को या विद्यार्थी को भी बता सकते हो ये बातें | 



 तो दोस्तों मैं हूँ एक पथप्रदर्शक जो हमेशा उपस्थित रहता हैं जो जिंदगी की परेशानियां होती हैं उन्हें सुलझाने के लिए और  आपको ये भी पता चलेगा की हारने का मुख्य कारन क्या होता हैं की हारने के बाद वो दुबारा खड़े नहीं हो पातें हैं और अपने आपसे चेहरा नहीं मिला पातें | 

तो आप भी इन सारी परेशानियों से जूझ रहे हैं क्या!!!!!!

१. कैसे निकले हारने के डर से बहार ?

२. हारने के बारें में बार बार सोचना कैसे बंद करे ?

३. कैसे बच्चों को इन डर से दूर रखे ?

कोई बात नहीं दोस्तों मैं हूँ आप सबकी परेशानी को दूर करने लिए और अपने ब्लॉग के माध्यम से !!!!!

तो चलिए शुरू करते हैं  इस बारें में बात करना। .... 

कैसे निकले हारने के डर से बहार। 

       


क्या होता हैं हारने का डर  ?            

असल में हारने का डर इंसान के लिए एक ऐसी स्तिथि हैं जहाँ पर वो सोचने लगता हैं की अब वो कुछ भी नहीं  कर पाएंगे इस समय पे | इसका मतलब ये हैं की अब उस इंसान में और धैर्य रखने की छमता नहीं हैं जब से वो हारा हैं,और एक अच्छे मौके को खोना और इत्यादि | दुनिया में बहुत सारे लोग हैं जो इस परिस्तिथिति से गुज़र रहे हैं 

लेकिन मेरे दोस्त आपको अपने ऊपर हमें हमेशा विश्वास करना चाहिए और अपने काबिलियत पैन कभी भी शंका नहीं करनी चाहिए | जो चीज़ बाकी लोग कर सकते हैं वो भी आप कर सकते हो | जिंदगी इत्ती छोटी नहीं हैं की आप विश्वासहीन हो जाएँ और  इस डर से की आप हार जायेंगे | अपने पैर पीछे हटा ले | 

आप बहुत ही ज्यादा ताक़तवर हो | जो ये हारने का डर हैं वो आपको जंजीर में बाँधना चाहता हैं जो दिखती नहीं हैं पर होती जरूर हैं | दोस्तों आपको इस समस्या से निकलने के लिए अपने अंदर शान्ति स्थापित करनी हैं | 


                           

प्रेरणादायी कहानी हार से जीत तक का असर 

तो ये कहानी हैं एक ऐसे इंसान की हैं जिसने अपने डर को हराया सिर्फ अपनी एक उत्कृष्ट  सोच से !!!!!

एक गांव में एक छोटा सा आदमी रहता था जिसका नाम बिरजू था | वह एक मिडिल क्लास का रहने वाला आदमी था और अपना गुजारा कुछ पैसे कामके किया करता था | जहा पैन वो मामूली से क्लर्क की नौकरी किया करता था | वो गांव में अपनी पत्नी और एक प्यारी से बच्ची के साथ रहा करते रहे | 

हर समय वो मेहनत करता था की उसे भी एक अच्छा काम मिले ,एक अच्छा अहोदा मिले जिसकी सबको चाहत होती हैं | क्योकि कम पैसो में भी उनका गुज़ारा नहीं हो पाता था | क्योकि उसकी बच्ची भी बड़ी हो रही थी| उनके ऊपर जिम्मेदारिन बढ़ रही थी इसलिए उन लोगों को और अच्छी काम की तलाश थी |  पर उसे कही भी काम नहीं मिल रहा था | 

असल में  परेशानी ये थी की वो हमेशा सोचता रहता था की -"मुझे काम मिलेगा की नहीं "| वो हमेशा ही ये सोचता था की मैं लायक हूँ या नहीं | फिर सोचता था की अगर उसके मालिक को उसका काम पसंद नहीं आएगा तो वह भी उसे नौकरी से निकाल देगा | 

जिस चीज़ के बारें में वो सोचता था वो उसे बहुत ही ज्यादा सोचा करता था मतलब अत्यधिक चिंतन किया करता था और एक डर सा बैठ गया था उसके मन में की अगर उसे काम नहीं मिला तो वो क्या करेगा | उसका खुद के ऊपर से विश्वास खोता जा रहा था | 

रोज़ रोज़ वो अपना सारा काम करता था और हर चीज़ को अच्छा बनाने की कोशिश भी किया करता था की उसे और अच्छा काम मिले | पर कभी कभी कुछ घटना उसके साथ  जाती थी | जैसे की कभी वो ऑफिस देर में पंहुचा करता था और कभी कभी उसकी फाइल खो जाया करती थी | 

वो बहुत ज्यादा ही परेशानी में चला गया था अपने काम को लेकर की अब उसे रात भर नींद नहीं आती थी | अब उसने नींद की दवाई भी लेनी पड़ रही थी | उसने हर तरीके के प्रयास कर लिए थे जैसे की अपने बड़ो से बात की, उसने अच्छे से अच्छे व्यक्ति की सलाह ली पर उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था | और उससे कुछ भी नहीं हो रहा था | 

एक दिन बिरजू की बेटी ने उससे जिद किया की वो उसे साइकिल दिलाएं क्योकि उसके स्कूल में  सबके पास एक साइकिल थी | पर बिरजू अपनी बच्ची से बहुत प्यार करता था तो वो उसे मना नहीं कर पाया और अपनी बेटी के लिए एक छोटी  साइकिल ले आया | 

उसने बाद उसकी बेटी ने यह जिद पकड़ ली की वो साइकिल सीखेगी | पर बिरजू को लगा की वह छोटी से बच्ची कैसे सीखेगी इत्ती जल्दी | पर बिरजू की बेटी ने एक हफ्ते के अंदर ही साइकिल चलाना सीख लिया | और उसने यह बात बिरजू को भी बतायी  और उसे बहुत आश्चर्य हुआ | 



क्या ये कोई जादू था ? 

नहीं दोस्तों ये कोई जादू नही था और न ही कोई भ्रम | ये एक ऐसी स्तिथि हैं जिसमें इंसान हमेशा एक सकारात्मक विचार के साथ काम करता हैं | जिससे आस पास की तरंगे भी प्रभावित होती हैं | एक दिन उसके पिता भी यह बात समझ जातें हैं की सकारात्मक रहना कितना जरुरी हैं जीवन में | 

हताश तो सब रहते हैं पर दिल में विश्वास रखके आगे बहुत काम लोग बढ़ पातें हैं | अब उसके पिता ने भी सकारात्मक सोचना शुरू कर दिया था और उनके अंदर एक अलग ही ऊर्जा थी | उसके बाद कुछ दिनों में उनके सारे बिगड़े हुए काम सही होने शुरू हो गए | 

बिरजू को फिर से अच्छी नौकरी का पैगाम आया और वो भी अपनी पूरी निष्ठा से मेहनत करने लगा | तो देखा दोस्तों आपने कैसे बिरजू ने अपनी हार को अपनी जीत में बदला | 

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